Tuesday, May 14, 2019

क़िस्सा उस अंग्रेज़ ब्रिगेडियर का जिसे 1857 के गदर में गोली मारी गई थी

सन 1857 के सिपाही विद्रोह की तारीख (11 मई) नज़दीक आते ही उन भारतीय और ब्रिटिश लोगों का ध्यान आता है जिन्होंने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
हालांकि उनमें से कई लोग दूसरे खेमे से जुड़े हुए थे. इनमें एक नाम ब्रिगेडियर जनरल जॉन निकोल्सन का भी था जिनकी भरी जवानी में तकलीफ़देह मौत हो गई थी.
लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी को चाहने वाले लोगों के बीच जॉन निकोल्सन का दर्जा एक हीरो की तरह था.
इस बात पर यक़ीन करना एक पल के लिए तो मुश्किल लगता है कि आयरलैंड के इस फ़ौजी अफसर का स्मारक दिल्ली में एक धरोहर स्थल बन सकता है.
पर पिछले 162 बरसों के दौरान दिल्ली में निकोल्सन के स्मारक की स्थिति कुछ ऐसी ही हो चुकी है.
निकोल्सन ने 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने वाले विद्रोहियों से उसे छुड़ाने में अहम भूमिका निभाई थी.
हालांकि इस अभियान में निकोल्सन को अपनी जान गंवानी पड़ी, लेकिन इस युद्ध में उन्होंने एक ऐसे हीरो का दर्जा प्राप्त कर लिया था.
वो अपने देशवासियों के बीच ही नहीं बल्कि 'मुल्तानी हॉर्स' (ब्रितानी फौज की एक इकाई) में शामिल भारतीय सैनिकों के बीच भी बहुत लोकप्रिय थे.
उनकी निष्ठुरता से लेकर उनके नेतृत्व कौशल के बारे में भी कई किस्से कहे सुने जाते रहे हैं.
निकोल्सन के बारे में तमाम साहित्य उपलब्ध हैं लेकिन हाल ही में प्रकाशित हुई एक किताब में उन पर अच्छी रोशनी डाली गई है.
स्टुअर्ट फ्लिन्डर्स ने अपनी किताब 'कल्ट फ़ ए डार्क हीरोः निकोल्सन फ़ दिल्ली' के लिए उस रास्ते को खोजा जिसे निकोल्सन ने दिल्ली पर धावा बोलने के लिए चुना था.
इस किताब से ये पता चला कि भले ही अब तक दिल्ली का नक़्शा काफी कुछ बदल चुका है लेकिन इसमें उस दौर के कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निशान अभी भी
ऐसा लगता है कि ये वो पट्टिका नहीं थी जो ब्रितानी दौर में लगाई गई थी लेकिन वो आज़ादी के बाद लगाई गई एक अनुकृति थी.
इसमें निकोल्सन का ज्यादा गुणगाान तो नहीं था लेकिन इसमें उस अचूक निशानेबाज की तारीफ की गई थी जिसने एक दोमंज़िले मकान की खिड़की से निकोल्सन को उस वक्त गोली मारी थी जब वह लाहौरी गेट पर धावा बोलने के दौरान अपने जवानों का नेतृत्व करते हुए हवा में तलवार लहरा रहा था.
निकोल्सन के नाम पर बनाए गए पार्क के अब अवशेष ही बचे हुए थे लेकिन जिस कब्रिस्तान में उन्हें दफनाया गया था, उसके आस-पास चुनिंदा रातों में निकोल्सन का सिरविहीन धड़ घूमते हुए नज़र आने की कहानियां सुनने को मिला करती थीं.
ये कहानियां कई सवाल पैदा करती थीं क्योंकि निकोल्सन का सिर कलम नहीं किया गया था, उन्हें पीछे से गोली मारी गई थी और उनका सिर धड़ से अलग नहीं हुआ था.
इसी से जुड़ी एक और कहानी एक गोरी महिला के बारे में है, जो कभी-कभी आधी रात के बाद कश्मीरी गेट पर नजर आती हैं जहां लगी एक पट्टिका सही-सलामत है.
इसमें ब्रिटिश सैनिकों द्वारा गेट पर धावा बोलने और इस हमले के दौरान मारे गए व्यक्तियों के बारे में जानकारी है.
निकोल्सन की प्रतिमा को साल 1952 में आयरलैंड भेजने का फैसला लिए जाने से पहले तक इस पट्टिका के ठीक सामने लगी हुई थी.
गोरी महिला सिगरेट पीते दिखाई पड़ती हैं, जिसका मतलब है कि वो 'विद्रोह' के समय की नहीं है.
वो संभवतः बाद के किसी समय की है जो कश्मीरी गेट पर किसी हताश प्रेमी या फिर रात में किसी चोर के हाथों मारी गई थीं.
इसमें कोई शक नहीं कि निकोल्सन यहाँ तस्वीर में फिट नहीं बैठते हैं. वैसे भी वो स्त्रियों के चहेते पुरुष नहीं थे.
निकोल्सन की ज़िंदगी में रोमांस कितना रहा होगा, इसके बारे में कोई पक्की जानकारी नहीं है लेकिन इसके बावजूद इसी तरह से कहानियां गढ़ी जाती रहीं.
इस तरह निकोल्सन के कथित प्रेत को अपने ही देश की एक महिला के साथ जोड़ने की कहानी शुरू हुई.
बचे हुए हैं.
स्टुअर्ट ने रिंग रोड की तरफ से पुरानी दिल्ली का चक्कर लगाया, इस दौरान नष्ट हो चुकी पुराने शहर की दीवार से होते हुए कश्मीरी गेट पहुंचे जिसका गुंबद अभी भी है जबकि बर्न बैस्टियन और लाहौरी गेट का अब वजूद नहीं है.
उन्हें संगमरमर के स्मारक की वह पट्टिका भी नहीं मिली जो निकोल्सन को गोली मारे जाने वाले स्थान की ओर संकेत देती थी.
हालांकि क़रीब 10 साल पहले मैंने 'विद्रोह' से जुड़े स्थानों और अंत में खारी बावली ले जाने के लिए ब्रिटिश नागरिकों के एक ग्रुप का नेतृत्व किया था.
काफ़ी खोजने के बाद हम एक संकरी गली में पहुंचे जहां कुछ लोग बर्फ़ और दूसरा सामान बेच रहे थे.
पहले तो वे समझ ही नहीं सके कि आख़िर हम क्या चाहते हैं लेकिन तमाम तरह की सफाई देने के बाद उन्होंने अपने पीछे की दीवार से एक टाट का टुकड़ा हटाया और वहां स्मारक पट्टिका नजर आई.

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